मेरी पुरानी कलम के अल्फाज……………….

एक दिन में यूं ही कुछ सोच रहा था तब किसी की याद में कुछ लिखने लगा। फिर अपनी पुरानी कलम जिस पर वर्षों से धूल जमी हुई थी। पहले तो साफ किया, फिर उसी के साथ रखी वो पुरानी दवात जिसमें काली स्याही तो थी मगर वो भी जम सी गई थी। फिर मैं सोच में पड़ गया कि कैसे अपनी सोच को

उस कागज के पन्ने पर उकेरूं कैसे? फिर में थका हारा दोपहर के समय firmaकिसी दुकान पर गया और दुकानदार को पूछा भाई साहेब क्या आपके पास पुरानी कलम वाली स्याही मिलेगी ? तभी दुकानदार बोला भाई साहेब आजकल तो इंक पैन का जमाना है आप ऐसा करो कि इसे छोड़ कर इंक पैन ले लो। बस मैं सुनकर उस दुकान से निकल आया। मेरे ख्यालात पुराने जमाने से जुडे़ थे। फिर मैंने अपनी कलम को उठाया और उसे निहारता रहा। वर्षों बाद लिखने लगा तो पता चला कि मेरी पुरानी कलम बेकार सी हो गई थी। मैंने सोचा अब मुझे तो अपनी सोच को शब्द देने हैं क्यों न मैं इस कलम के लिए स्याही बना लूं। तब मुझे ख्याल आया कि मेरा पोता जो स्कूल जाता है उससे ले लूं तब मुझे इंक मिल गई।

 

 

मैं लिखने लगा कि मेरे जमाने के लोग तो बडे़ ही भोले भाले थे। अक्सर जब वो मिलते थे तो किसी पीपल के पेड़ के नीचे बने पत्थर के अटियाले पर बैठा करते थे और बातें करते थे। लोग त्यौहारों में अपने आसपास के घरों में जाकर मिठाई बांटते थे।

जवानी के दिन लिखने लगा कि कभी किसी से महोब्बत हुई थी उन दिनों जब मैं पांचवी मैं पढ़ता था। मगर वो अपने किसी रिश्तेदार के यहां पढ़ने चली गई और मेरी आधी अधूरी सी रह गई।

मैं भी  पढ़ता रहा। बारह पढ़ने के बाद घर वालों ने बोला कि बेटा अब ऐसा कर कि कुछ काम कर क्यिंकि तुझे तो पता है कि तेरे पापा की हालत भी ठीक नहीं रहती। तू कुछ कमायगा तब घर का खर्च चल सकता है। मैं रात भर परेशान रहा क्यिंकि मुझे पढ़ने का शौक तो था मगर क्या करता। फिर मैं किसी दुकान पर काम करने लगा। मगर अपने दोस्तों को कॉलेज जाते हुए देखता तो दिल में अरमान जगने लगा कि काश मैं भी स्कूल जाता।

मुझे अब दुकान से अच्छे पैसे मिलने लगे। मतलब अपना खर्चा तो निकलने लगा और बचत भी थोड़ी बहुत होने लगी। मैंने फिर एक साल के बाद कॉलेज में एडमिशन ले ली। मैं एक बार फिर कॉलेज पहुंचा। धीरे-धीरे कहीं कुछ भी किसी के साथ काम करने लगा और पढ़ाई भी करता रहा। फिर मेरी बीए की पढ़ाई पूरी हो गई। उसके बाद शहर चला गया। अब घर की हालत भी सुधर गई थी। अब मुझे कंपनी में नौकरी मिल गई थी। कुछ महीने के बाद उस लड़की का मेरे आफिस में आना हुआ तो पता चला कि वो तो मेरे आफिस में काम करती है पर कुछ दिनों से छुट्टी पर थी। जब मैं उससे मिला तो उसने मुझे पहचान लिया और बातें करते-करते मैंने अपनी बचपन की बात बता दी। तो उसने बताया कि उसका अफेयर तो था मगर खत्म हो गया था। फिर मैंने उसका हाथ थामा और कहा कि क्या तुम मेरा साथ दोगी तो वो रोती-रोती हंसने लगी। शायद मुझे इस सवाल का जवाब मिल गया था। तो दोस्तों यह थी मेरी कहानी़…………Written by Ashok Pabjoria

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