जैसी करनी वैसी भरनी

2001-04-26-poke

एक बार की बात है किसी गांव में एक किसान रहता था। जोकि दूध से दहीं और मक्खन बनाकर उसे बेचकर घर चलाता था। एक दिन उसकी पत्नी ने उसे मक्खन तैयार करके दिया। वह उसे बेचने के लिए अपने गांव के लिए शहर की ओर रवाना हो गया। वो मक्खन गोल-मोल पेढ़ो की शक्ल में बना हुआ था और हर पेढ़े का वजन एक किलोग्राम था। शहर में किसान ने उस मक्खन को रोज की तरह एक दुकानदार को बेच दिया और दुकानदार से चाय-पति और चीनी, रसोई का तेल और अन्य सामान खरीद कर वापिस अपने गांव जाने के लिए रवाना हो गया। उस किसान के जाने के बाद दुकानदार ने मक्खन को फ्रिज में रखना शुरू कर दिया और उसे ख्याल आया कि क्यों न इनमें से एक पेढ़े का वजन चैक किया जाए। वजन तोलने पर पेढ़ा सिर्फ नौ सौ ग्राम का निकला। हैरत और निराशा से उसने सारे पेढ़े तोल डाले। मगर किसान के लाए हुए सभी पेढ़े नौ सौ ग्राम के ही निकले। ठीक अगले हफते फिर किसान हमेशा की तरह मक्खन लेकर जैसे ही दुकानदार की दहलीज पर पहुंचा तो दुकानदार ने किसान से चिल्लाते हुए कहा तू दफा हो जा यहां से। किसी बेईमान और धोखेबाज शक्स से कारोबार करना पर मुझसे नहीं। नौ सौ ग्राम मक्खन को पूरा एक किलो कहकर बेचने वाले शक्स की वो शक्ल भी देखना नहीं चाहता। किसान ने बड़ी ही विनम्रता से दुकानदार से कहा ‘‘ मेरे भाई मुझसे वजन न हुआ हम तो गरीब और बेचारे लोग हैं हमारे पास माल तोल के लिए वजन खरीदने की हैसियत कहां। आप से जो एक किलो चीनी लेकर जाता हूं। उसी को तराजू के एक पलड़े में रखकर दूसरे पलड़े में उतने ही वजन का मक्खन तोलकर ले आता हूं।
शिक्षा – जो हम दूसरों को देंगे वही लौट कर आएगा। फिर चाहे वो इज्जत, सम्मान हो या फिर धोखा।

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