DANVEER BHAMASHAH/दानवीर भामाशाह ( Part-9 Antim Bhag)

Madhusudan Singh

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Image credit ; Google
पराधीन रहना ना जाना,
जीते जी वह हार ना माना,
त्याग सुख महलों की जिसने,खाई रोटी घास की,
दोहराता हूँ कथा वीर उस महाराणा प्रताप की|२|

मुगल पताके लहराये थे दुर्ग सहित मेवाड़ में,
राजपूत घुटनों के बल थे,अकबर के दरबार में,
मगर खौफ अकबर को जिंदा शेर अभी भी जंगल में,
जश्न जीत का मातम कर देने को तटपर जंगल में,
फ़ौज मुगलिया ख़ाक छानते,ढूँढ रहे थे राणा को,
धन्य भील जंगल के घेरे साथ खड़े थे राणा को,
राणा संग परिवार दुर्ग को छोड़ बसा था जंगल में,
कंद,मूल खा स्वाभिमान को ज़िंदा रखा जंगल में,
बेटे,पत्नी भूख से मरते,आँखों से अंगार बरसते,
दुसह दर्द सहता खाता जंगल में रोटी घास की,
दोहराता हूँ कथा वीर उस महाराणा प्रताप की|२|

बड़ी फौज मुगलों से मुश्किल,राणा का टकराना था,
शस्त्र कहाँ से लाते वन में मुश्किल मिलना खाना था,
मगर…

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