कांगड़ा में रली (रलियाँ दा बयाह)पूजन परम्परा के बारे में

हिमाचल प्रदेश का यह त्योहार देवी- देवताओ की पूजा से जुड़ा हुआ है,शिवजी और पार्वती से! हिमाचल प्रदेश शिव भगवान की क्रीड़ा भूमि तथा माँ पार्वती की जन्मस्थली है,यहाँ की धरती के कण-कण से कई धार्मिक और सांस्कृतिक आस्थयें जुड़ी हुई हैं, भोले-भाले लोगो की यह आस्थयें यहाँ के मेलों,ब्र्तों,त्योहारों,और पूजनों से प्रकट होती हैं, इसलिए हिमाचल को देव भूमि भी कहा गया है!

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विवाह के पूर्वभयास के रूप में मनाया जाने वाला यह पर्व “रलियाँ दा बयाह” पूरे कांगड़ा क्षेत्र में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है! गाँव की युवा कन्याए इस में शिव और पार्वती की मूर्तियों की पूजा करती हैं,यह पर्व पूरे एक महीने तक मनाया जाता है! गाँव की कन्याए रोज सुबह और शाम को देवी-देवता की पूजा करती हैं भजन कीर्तन आदि करती हैं!

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image source naidunia.jagran.com

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इसके पीछे एक किवंदती प्रचलित है कि पुराने समय में कांगड़ा के किसी गाँव में एक ब्राह्मण ने अपनी नौजवान लड़की रली का विवाह उस से आयु में बहुत छोटे लड़के से करा दिया! लड़की ने इसका विरोध भी किया परन्तु उस समय विवाह माँ-बाप की इच्छा के अनुसार ही होते थे! उस लड़की का विवाह शंकर नाम के लड़के से कर दिया! कन्या को विदा कर के उसे उसके पति के घर रवाना कर दिया परम्परा के अनुसार उसका छोटा भाई जिसका नाम बास्तु था साथ भेज दिया रली को जब डोली में बैठा के ले जा रहे थे तो रास्ते में एक नदी पड़ती थी,उसने डोली को रोक कर अपने भाई को बुलाया और कहा में इस विवाह से खुश नहीं हूँ और मैं अपनी पूरी जिंदगी इस छोटी आयु के पति के साथ नहीं बिता सकती,इसमे और किसी का दोष नहीं है! लेकिन आज के बाद जो भी अविवाहित कन्या हर वर्ष चेत्र मास में श्रधापूर्वक शिव-पार्वती की पूजा कर के उनका विवाह रचाएगी उसको योग्य और मनचाहा वर मिलेगा,यह कह कर रली नदी के गहरे पानी में अपने आप को आत्मसार कर लिया उसके दूल्हे ने जब उसको देखा तो उसेनए भी उसके पीछे पानी में छलाँग लगा दी और बह दोनो नदी की तेज धारा में बह गये!

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कहा जाता है कि उसी दी के बाद रली विवाह का प्रचलन आरंभ हो गया, तब से लेकर अविवाहित कन्याए चेत्र मास की संक्रांति को किसी एक के घर में कौड़ी दबा कर के पूजा करती हैं,और भगवान शिव और पार्वती की मूर्तियाँ मिट्टी से बनाती हैं और आगामी संक्रांति को रली और शंकर का विवाह रचा कर उन्हे नदी में बहा दिया जाता है,पहले यह त्योहार मटोर के मानुनी पुल के पास बड़ी धूम धाम से मनाया जाता था लेकिन अब यह त्योहार कांगड़ा के लगभग हर क्षेत्र में मनाया जाता है! हिंदू शास्त्रो के अनुसार जिस भी कन्या का विवाह नहीं हो पाता है, उसका विवाह इस दिन किया जाता है जिसे अत्ती शुभ माना जाता है!

This festival of Himachal Pradesh is associated with worship of Goddess Devtao, from Shivaji and Parvati! Himachal Pradesh Shiva is Lord God’s playground and the birthplace of Lord Parvati, here many particles of earth and religion are associated with the particles of the particles, the hopes of the naive people are manifested here by fairs, festivals, festivals and worship Therefore, Himachal has been called Dev Bhoom! This festival celebrated as an antecedent of marriage is celebrated with great splendor in the entire Kangra region! The young girls of the village worship idols of Shiva and Parvati in this, this festival is celebrated for a whole month! The daughters of the village worship Goddesses every morning and evening, they perform bhajan kirtan etc. There is a trend behind it that in the past, a Brahmin married a young girl, Rally, in a village in Kangra, from that age to a very young boy! The girl also opposed it, but at that time marriage was done according to the wishes of the parents! That girl married the boy named Shankar! After leaving the girl, she sent her to her husband’s house, according to the tradition, when her younger brother, whose name was Baastu, was sent along with Rally when she was taking her in the dolly, there was a river on the way, she stopped the dolly. Called his brother and said, ‘I am not happy with this marriage and I can not spend my entire life with this younger age husband, there is no fault of anyone else in this!’ But today after the unmarried daughter who worshiped Shiva and Parvati every year, they will get her husband and husband, by saying that, in the deep water of the river Rally, the soul has taken the soul to self. When he saw him, he tried to flutter in the water behind him, and the two flowing in the torrent of river! It is said that after the same rite, the practice of marriage started, and since then, the unmarried girls worship the Sankranti of Chaitra month by pressing the clerk in one’s house and making idols of Lord Shiva and Parvati from the soil. And the upcoming Sankranti is sacked by Rally and Shankar’s marriage and flown into the river, earlier this festival was celebrated with great gesture near the Manuni bridge of Mutore but now it is celebrated And Kangra is celebrated in almost every area! According to Hindu scriptures, any girl who can not get married, is married on this day, which is considered as auspicious auspiciousness!

source:- Book अलौकिक हिमाचल प्रदेश  written By:-Jagmohan Balokhara

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