जब अकबर जवालामुखी देवी मंदिर आया

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जब अकबर काबुल की और प्रस्थान कर रहा था तब बह जाते समय होशियारपुर में थोडा वक़्त रुका और वहाँ के लोगों में उसने देखा की उस समय कांगड़ा में कई कलायें थी जिनमे नेत्र चिकित्सा, शरीर के अंगो जैसे नाक कान आदि को बनाना शामिल था! और बातें भी कांगड़ा को बहुत आकर्षक बनाती थी यहाँ पर नये किस्म के सुगंधित चावल और एक बहुत ही मजबूत किला था!

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यहाँ ऐसी देवी की पूजा की जाती है जिसकी ज्योति अत्यंत जलती ही रहती है और यहाँ किसी देवी को भक़्त अपनी जिहवा काट कर चाड़ते हैं!IMG_6427

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 यह सुन कर अकबर ज्वालामुखी देवी के मंदिर को देखने के लिए गया ,अकबर ने देवी की परीक्षा लेने के लिए एक पानी की नाली(कुल्ह) का निर्माण करवाया लेकिन फिर भी ज्योति जलती ही रही यह देख कर अकबर देवी उपासक बन गया,और उसने सोने का छत्र देवी को चड़ाया!
इसका पता यहाँ के एक लोक गीत जो देवी की स्तुति में गाया जाता है,:-“नंगी नंगी पैरी देवी अकबर आया,सोने दा छत्र चड़ाया”. से भी चलता है!

 

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